श्री पन्नगाद्रि वर शिखराग्रवासुनकु पापान्धकार घन भास्करुनकू
आ परात्मुनकु नित्यानपायिनियैन मा पालि अलमेलुमङ्गम्मकू (१)
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
शरणन्न दासुलकु वरमित्तुननि बिरुदु धरियिञ्चियुन्न पर दैवमुनकू
मरुव वलदी बिरुदु निरतमनि पतिनि एमरनीयनलमेलु मङ्गम्मकू (२)
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
आनन्द निलयमन्दनिशम्बु वसियिञ्चि दीनुलनु रक्षिञ्चु देवुनकुनू
कानुकल नॊनगूर्चि घनमुगा विभुनि सन्मानिञ्चु अलमेलु मङ्गम्मकू (३)
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
परमॊसग ना वन्तु नरुलकनि वैकुण्ठमरचेत चूपु जगदात्मुनकुनू
सिरुलॊसग तन वन्तु सिद्धमनि नायकुनि उरमुपै कॊलुवुन्न शरधिसुतकू (४)
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
तॆलिवितो मुडुपुलिटु तॆम्मु तॆम्मनि परुष नलिगिञ्चि गैकॊनॆडि अच्युतुनकू
ऎलमि पाकम्बु जेयिञ्चि अन्दरकन्न मलयकॆपुडॊसगॆ महामातकू (५)
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
जय मङ्गलं नित्य शुभमङ्गलं
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